अध्याय 13 महासागरीय जल संचलन

महासागरीय जल स्थिर न होकर गतिमान है। इसकी भौतिक विशेषताएँ (जैसे- तापमान, खारापन, घनत्व) तथा बाहय बल (जैसे- सूर्य, चंद्रमा तथा वायु) अपने प्रभाव से महासागरीय जल को गति प्रदान करते हैं। महासागरीय जल में क्षैतिज व ऊर्ध्वाधर दोनों प्रकार की गतियाँ होती हैं। महासागरीय धाराएँ व लहरें क्षैतिज गति से संबंधित हैं। ज्वारभाटा ऊर्ध्वाधर गति से संबंधित है। महासागरीय धाराएँ एक निश्चित दिशा में बहुत बड़ी मात्रा में जल का लगातार बहाव है। जबकि, तरंगें जल की क्षैतिज गति हैं। धाराओं में जल एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचता है, जबकि तरंगों में जल गति नहीं करता है। लेकिन, तरंग के आगे बढ़ने का क्रम जारी रहता है। ऊर्ध्वाधर गति महासागरों एवं समुद्रों में जल के ऊपर उठने तथा नीचे गिरने से संबंधित है। सूर्य एवं चंद्रमा के आकर्षण के कारण, महासागरीय जल एक दिन में दो बार ऊपर उठते एवं नीचे गिरते हैं। अधःस्तल से ठंडे जल का उत्प्रवाह एवं अवप्रवाह महासागरीय जल के ऊर्ध्वाधर गति के प्रकार हैं।

तरंगे

तरंगें वास्तव में ऊर्जा हैं, जल नहीं, जो कि महासागरीय सतह के आर-पार गति करते हैं। तरंगों में जल कण छोटे वृत्ताकार रूप में गति करते हैं। वायु जल को ऊर्जा प्रदान करती हैं, जिससे तरंगें उत्पन्न होती हैं। वायु के कारण तरंगें महासागर में गति करती हैं तथा ऊर्जा तटरेखा पर निर्मुक्त होती है। सतह जल की गति महासागरों के गहरे तल के स्थिर जल को कदाचित् ही प्रभावित करती है। जैसे ही एक तरंग महासागरीय तट पर पहुँचती है इसकी गति कम हो जाती है। ऐसा गत्यात्मक जल के मध्य आपस में घर्षण होने के कारण होता है तथा जब जल की गहराई तरंग के तरंगदैर्ध्य के आधे से कम होती है तब तरंग टूट जाते हैं। बड़ी तरंगें खुले महासागरों में पायी जाती हैं। तरंगें जैसे ही आगे की ओर बढ़ती हैं बड़ी होती जाती हैं तथा वायु से ऊर्जा को अवशोषित करती हैं। अधिकतर तरंगें वायु के जल की विपरीत दिशा में गति से उत्पन्न होती हैं। जब दो नॉट या उससे कम वाली समीर शांत जल पर बहती है, तब छोटी-छोटी उर्मिकाएँ (Ripples) बनती हैं तथा वायु की गति बढ़ने के साथ ही इनका आकार बढ़ता जाता है, जब तक इनके टूटने से सफेद बुलबुले नहीं बन जाते। तट के पास पहुँचने, टूटने तथा सफेद बुलबलों में सर्फ की भाँति घुलने से पहले तरंगें हजारों कि॰मी॰ की यात्रा करती हैं।

एक तरंग का आकार एवं आकृति उसकी उत्पत्ति को दर्शाता है। युवा तरंगें अपेक्षाकृत ढाल वाली होती हैं तथा संभवतः स्थानीय वायु के कारण बनी होती हैं। कम एवं नियमित गति वाली तरंगों की उत्पत्ति दूरस्थ स्थानों पर होती है, संभवतः दूसरे गोलार्ध में। तरंग के उच्चतम बिंदु का पता वायु की तीव्रता के द्वारा लगाया जाता है, यानि यह कितने समय तक प्रभावी है तथा उस क्षेत्र के ऊपर कितने समय से एक ही दिशा में प्रवाहमान है?

चित्र 13.1 : तरंगों की गति एवं जलीय-अणु

तरंगें गति करती हैं, क्योंकि वायु जल को प्रवाहित करती है जबकि गुरुत्वाकर्षण बल तरंगों के शिखरों को नीचे की ओर खींचता है। गिरता हुआ जल पहले वाले गर्त को ऊपर की ओर धकेलता है एवं तरंग नये स्थिति में गति करती हैं। तरंगों के नीचे जल की गति वृत्ताकार होती है। यह इंगित करता है कि आती हुई तरंग पर वस्तुओं का वहन आगे तथा ऊपर की ओर होता है एवं लौटती हुई तरंग पर नीचे तथा पीछे की ओर।

तरंगों की विशेषताएँ

तरंग शिखर एवं गर्त (Wave crest and trough)

एक तरंग के उच्चतम एवं निम्नतम बिंदुओं को क्रमशः शिखर एवं गर्त कहा जाता है।

तरंग की ऊंचाई (Wave height)

यह एक तरंग के गर्त के अधःस्थल से शिखर के ऊपरी भाग तक की ऊर्ध्वाधर दूरी है।

तरंग आयाम (Amplitude)

यह तरंग की ऊँचाई का आधा होता है।

तरंग काल (Wave period)

तरंग काल एक निश्चित बिंदु से गुजरने वाले दो लगातार तरंग शिखरों या गर्तों के बीच का समयान्तराल है।

तरंगदैर्ध्य (Wavelength)

यह दो लगातार शिखरों या गर्तों के बीच की क्षैतिज दूरी है।

तरंग गति (Wave speed)

जल के माध्यम से तरंग के गति करने की दर को तरंग गति कहते हैं तथा इसे नॉट में मापा जाता है।

तरंग आवृत्ति

यह एक सेकेंड के समयान्तराल में दिए गए बिंदु से गुजरने वाली तरंगों की संख्या है।

ज्वार-भाटा

चंद्रमा एवं सूर्य के आकर्षण के कारण दिन में एक बार या दो बार समुद्र तल का नियतकालिक उठने या गिरने को ज्वारभाटा कहा जाता है। जलवायु संबंधी प्रभावों (वायु एवं वायुमंडलीय दाब में परिवर्तन) के कारण जल की गति को महोर्मि (Surge) कहा जाता है। महोर्मि ज्वारभाटाओं की तरह नियमित नहीं होते। ज्वारभाटाओं का स्थानिक एवं कालिक रूप से अध्ययन बहुत ही जटिल है, क्योंकि इसके आवृत्ति, परिमाण तथा ऊँचाई में बहुत अधिक भिन्नता होती है।

चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण के कारण तथा कुछ हद तक सूर्य के गुरुत्वाकर्षण द्वारा ज्वारभाटाओं की उत्पत्ति होती है। दूसरा कारक, अपकेंद्रीय बल है, जो कि गुरुत्वाकर्षण को संतुलित करता है। गुरुत्वाकर्षण बल तथा अपकेंद्रीय बल दोनों मिलकर पृथ्वी पर दो महत्वपूर्ण ज्वारभाटाओं को उत्पन्न करने के लिए उत्तरदायी है। चंद्रमा की तरफ वाले पृथ्वी के भाग पर, एक ज्वारभाटा उत्पन्न होता है, जब विपरीत भाग पर चंद्रमा का गुरुत्वीय आकर्षण बल उसकी दूरी के कारण कम होता है, तब अपकेंद्रीय बल दूसरी तरफ ज्वार उत्पन्न करता है। (चित्र 13.2)

ज्वार उत्पन्न करने वाले बल, इन दो बलों के बीच के अंतर है; यानि चंद्रमा का गुरुत्वीय आकर्षण तथा अपकेंद्र बल। पृथ्वी के धरातल पर, चंद्रमा के निकट

चित्र 13.2 : गुरुत्वाकर्षण बल और ज्वारभाटा के मध्य संबंध

वाले भागों में अपकेंद्रीयकरण बल की अपेक्षा गुरुत्वाकर्षण बल अधिक होता है और इसलिए यह बल चंद्रमा की ओर ज्वारीय उभार का कारण है। चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी के दूसरी तरफ कम होता है, क्योंकि यह भाग चंद्रमा से अधिकतम दूरी पर है तथा यहाँ अपकेंद्रीय बल प्रभावशाली होता है। अतः यह चंद्रमा से दूर दूसरा उभार पैदा करता है। पृथ्वी के धरातल पर, क्षैतिज ज्वार उत्पन्न करने वाले बल ऊर्ध्वाधर बलों से अधिक महत्वपूर्ण हैं जिनसे ज्वारीय उभार पैदा होते हैं।

कनाडा में फंडी खाड़ी के ज्वारभाटा

विश्व का सबसे ऊँचा ज्वारभाटा कनाडा के नवास्कोशिया में स्थित फंडी की खाड़ी में आता है। ज्वारीय उभार की ऊँचाई 15 से 16 मीटर के बीच होती है क्योंकि वहाँ पर दो उच्च ज्वार एवं दो निम्न ज्वार प्रतिदिन आते हैं (लगभग 24 घंटे का समय), अतः एक ज्वार 6 घंटे के भीतर जरूर आता है। अनुमानतः ज्वारीय उभार एक घंटे में लगभग 2.4 मीटर ऊपर उठता है। इसका मतलब यह हुआ कि ज्वार प्रति मिनट 4 से॰मी॰ ज्यादा ऊपर की ओर उठता है। अगर आप समुद्री बीच पर टहलते हुए समुद्री भृगु के किनारे पहुँचे (जो प्राय: वहाँ होते हैं), आप ज्वार देखना न भूलें। अगर आप एक घंटे तक वहाँ हैं, तब आप पाएँगे जहाँ से आपने शुरू किया था, वहाँ पहुँचने के पहले ही पानी आपके सिर के ऊपर होगा।

जहाँ महाद्वीपीय मग्नतट अपेक्षाकृत विस्तृत हैं, वहाँ ज्वारीय उभार अधिक ऊँचाई वाले होते हैं। जब ये ज्वारीय उभार मध्य महासागरीय द्वीपों से टकराते हैं, तो इनकी ऊँचाई में अन्तर आ जाता है। तटों के पास ज्वारनद व खाड़ियों की आकृतियाँ भी ज्वारभाटाओं के तीव्रता को प्रभावित करते हैं। शंक्वाकार खाड़ी ज्वार के परिमाण को आश्चर्यजनक तरीके से बदल देता है। जब ज्वारभाटा द्वीपों के बीच से या खाड़ियों तथा ज्वारनद मुखों में से गुज़रता है, तो उन्हें ज्वारीय धारा कहते हैं।

ज्वारभाटा के प्रकार

ज्वार की आवृत्ति, दिशा एवं गति में स्थानीय व सामयिक भिन्नता पाई जाती है। ज्वारभाटाओं को उनकी बारंबारता एक दिन में या 24 घंटे में या उनकी ऊँचाई के आधार पर विभिन्न प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

आवृत्ति पर आधारित ज्वार-भाटा : (Tides based on frequency)

अर्ध-दैनिक ज्वार (Semi-diurnal) : यह सबसे सामान्य ज्वारीय प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत प्रत्येक दिन दो उच्च एवं दो निम्न ज्वार आते हैं। दो लगातार उच्च एवं निम्न ज्वार लगभग समान ऊँचाई की होती हैं।

दैनिक ज्वार (Diurnal tide) : इसमें प्रतिदिन केवल एक उच्च एवं एक निम्न ज्वार होता है। उच्च एवं निम्न ज्वारों की ऊँचाई समान होती है।

मिश्रित ज्वार (Mixed tide) : ऐसे ज्वार-भाटा जिनकी ऊँचाई में भिन्नता होती है, उसे मिश्रित ज्वार-भाटा कहा जाता है। ये ज्वार-भाटा सामान्यतः उत्तर अमरीका के पश्चिमी तट एवं प्रशांत महासागर के बहुत से द्वीप समूहों पर उत्पन्न होते हैं।

सूर्य, चंद्रमा एवं पृथ्वी की स्थिति पर आधारित ज्वारभाटा (Spring tides) : उच्च ज्वार की ऊँचाई में भिन्नता पृथ्वी के सापेक्ष सूर्य एवं चंद्रमा के स्थिति पर निर्भर करती है। वृहत् ज्वार एवं निम्न ज्वार इसी वर्ग के अंतर्गत आते हैं।

वृहत् ज्वार (Spring tides) : पृथ्वी के संदर्भ में सूर्य एवं चंद्रमा की स्थिति ज्वार की ऊँचाई को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है। जब तीनों एक सीधी रेखा में होते हैं, तब ज्वारीय उभार अधिकतम होगा। इनको वृहत् ज्वार-भाटा कहा जाता है तथा ऐसा महीने में दो बार होता है-पूर्णिमा के समय तथा दूसरा अमावस्या के समय।

निम्न ज्वार (Neap tides) : सामान्यतः वृहत् ज्वार एवं निम्न ज्वार के बीच सात दिन का अंतर होता है। इस समय चंद्रमा एवं सूर्य एक दूसरे के समकोण पर होते हैं तथा सूर्य एवं चंद्रमा के गुरुत्व बल एक दूसरे के विरूद्ध कार्य करते हैं। चंद्रमा का आकर्षण सूर्य के दोगुने से अधिक होते हुए भी, यह बल सूर्य के गुरुत्वाकर्षण के समक्ष धूमिल हो जाता है। चंद्रमा का आकर्षण अधिक इसलिए है, क्योंकि वह पृथ्वी के अधिक निकट है।

महीने में एक बार जब चंद्रमा पृथ्वी के सबसे नजदीक होता है (उपभू), असामान्य रूप से उच्च एवं निम्न ज्वार उत्पन्न होता है। इस दौरान ज्वारीय क्रम सामान्य से अधिक होता है। दो सप्ताह के बाद, जब चंद्रमा पृथ्वी से अधिकतम दूरी (अपभू) पर होता है, तब चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल सीमित होता है तथा ज्वार-भाटा के क्रम उनकी औसत ऊँचाई से कम होते हैं।

जब पृथ्वी सूर्य के निकटतम होती है, (उपसौर) प्रत्येक साल 3 जनवरी के आस-पास उच्च एवं निम्न ज्वारों के क्रम भी असामान्य रूप से अधिक न्यून होते हैं। जब पृथ्वी सूर्य से सबसे दूर होती है, (अपसौर) प्रत्येक वर्ष 4 जुलाई के आस-पास, ज्वार के क्रम औसत की अपेक्षा बहुत कम होते हैं। उच्च ज्वार व निम्न ज्वार के बीच का समय, जब जलस्तर गिरता है, ‘भाटा’ (Ebb) कहलाता है। उच्च ज्वार एवं निम्न ज्वार के बीच का समय जब ज्वार ऊपर चढ़ता है, उसे ‘बहाव’ या ‘बाढ़’ कहा जाता है।

ज्वार-भाटा का महत्व

चूँकि, पृथ्वी, चंद्रमा व सूर्य की स्थिति ज्वार की उत्पत्ति का कारण है और इनकी स्थिति के सही ज्ञान से ज्वारों का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। यह नौसंचालकों व मछुआरों को उनके कार्य संबंधी योजनाओं में मदद करता है। नौसंचालन में ज्वारीय प्रवाह का अत्यधिक महत्व है। ज्वार की ऊँचाई बहुत अधिक महत्वपूर्ण है, खासकर नदियों के किनारे वाले पोताश्रय पर एवं ज्वारनदमुख के भीतर, जहाँ प्रवेश द्वार पर छिछले रोधिका होते हैं, जो कि नौकाओं एवं जहाजों को पोताश्रय में प्रवेश करने से रोकते हैं। ज्वार-भाटा तलछटों के डीसिल्टेशन (Desiltation) में भी मदद करती है तथा ज्वारनदमुख से प्रदूषित जल को बाहर निकालने में भी। ज्वारों का इस्तेमाल विद्युत शक्ति (कनाडा, फ्रांस, रूस एवं चीन में) उत्पन्न करने में भी किया जाता है। एक 3 मैगावाट शक्ति का विद्युत संयत्र पश्चिम बंगाल में सुंदरवन के दुर्गादुवानी में लगाया जा रहा है।

महासागरीय धाराएँ

महासागरीय धाराएँ महासागरों में नदी प्रवाह के समान है। ये निश्चित मार्ग व दिशा में जल के नियमित प्रवाह को दर्शाते हैं। महासागरीय धाराएँ दो प्रकार के बलों के द्वारा प्रभावित होती हैं, वे हैं- (i) प्राथमिक बल, जो जल की गति को प्रारंभ करता है, तथा (ii) द्वितीयक बल, जो धाराओं के प्रवाह को नियंत्रित करता है।

प्राथमिक बल, जो धाराओं को प्रभावित करते हैं, वे हैं : (i) सौर ऊर्जा से जल का गर्म होना, (ii) वायु, (iii) गुरुत्वाकर्षण तथा (iv) कोरियोलिस बल (Coriolis force)। सौर ऊर्जा से गर्म होकर जल फैलता है। यही कारण है कि विषवत् वृत्त के पास महासागरीय जल का स्तर मध्य अक्षांशों की अपेक्षा 8 से॰मी० अधिक ऊँचा होता है। इसके कारण बहुत कम प्रवणता उत्पन्न होती है तथा जल का बहाव ढाल से नीचे की तरफ़ होता है। महासागर के सतह पर बहने वाली वायु जल को गतिमान करती है। इस क्रम में वायु एवं पानी की सतह के बीच उत्पन्न होने वाला घर्षण बल जल की गति को प्रभावित करता है। गुरुत्वाकर्षण के कारण जल नीचे बैठता है और यह एकत्रित जल दाब प्रवणता में भिन्नता लाता है। कोरियालिस बल के कारण उत्तरी गोलार्ध में जल की गति की दिशा के दाहिनी तरफ़ और दक्षिणी गोलार्ध में बायीं ओर प्रवाहित होता है तथा उनके चारों ओर बहाव को वलय (Gyres) कहा जाता है। इनके कारण सभी महासागरीय बेसिनों में वृहत् वृत्ताकार धाराएँ उत्पन्न होती हैं।

पानी के घनत्व में अंतर, महासागरीय जलधाराओं के ऊर्ध्वाधर गति को प्रभावित करता है। अधिक खारा जल निम्न खारे जल की अपेक्षा ज्यादा सघन होता है तथा इसी प्रकार ठंडा जल, गर्म जल की अपेक्षा अधिक सघन होता है। सघन जल नीचे बैठता है, जबकि हल्के जल की प्रवृत्ति उपर उठने की होती है। ठंडे जल वाली महासागरीय धाराएँ तब उत्पन्न होती हैं, जब ध्रुवों के पास वाले जल नीचे बैठते हैं एवं धीरे-धीरे विषुवत् वृत्त की ओर गति करते हैं। गर्म जलधाराएँ विषुवत् वृत्त से सतह के साथ

महासागरीय धाराओं की विशेषताएँ

धाराओं की पहचान उनके प्रवाह से होती है। सामान्यत: धाराएँ सतह के निकट सर्वाधिक शक्तिशाली होती हैं व यहाँ इनकी गति 5 नॉट से अधिक होती है। गहराई में धाराओं की गति धीमी हो जाती है, जो 0.5 नॉट से भी कम होती है। हम किसी धारा की गति को उसके वाह (Drift) के रूप में जानते हैं। वाह को नॉट में मापा जाता है। धारा की शक्ति का संबंध उसकी गति से होता है।

चित्र 13.3 : महासागरों में प्रमुख धाराएँ

होते हुए ध्रुवों की ओर जाती हैं और ठंडे जल का स्थान लेती हैं।

महासागरीय धाराओं के प्रकार

महासागरीय धाराओं को उनकी गहराई के आधार पर ऊपरी या सतही जलधारा (Surface current) व गहरी जलधारा (Deep water currents) में वर्गीकृत किया जा सकता है- (i) ऊपरी जलधारा - महासागरीय जल का 10 प्रतिशत भाग सतही या ऊपरी जलधारा है। यह धाराएँ महासागरों में 400 मी॰ की गहराई तक उपस्थित हैं। (ii) गहरी जलधारा - महासागरीय जल का 90 प्रतिशत भाग गहरी जलधारा के रूप में है। ये जलधाराएँ महासागरों में घनत्व व गुरुत्व की भिन्नता के कारण बहती हैं। उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में, जहाँ तापमान कम होने के कारण घनत्व अधिक होता है, वहाँ गहरी जलधाराएँ बहती हैं, क्योंकि यहाँ अधिक घनत्व के कारण पानी नीचे की तरफ बैठता है।

महासागरीय धाराओं को तापमान के आधार पर गर्म व ठंडी जलधाराओं में वर्गीकृत किया जाता है। (i) ठंडी जलधाराएँ, ठंडा जल, गर्म जल क्षेत्रों में लाती हैं। ये महाद्वीपों के पश्चिमी तट पर बहती हैं। (ऐसा दोनों गोलार्धों में निम्न व मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों में होता है) और उत्तरी गोलार्ध के उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में ये जलधाराएँ महाद्वीपों के पूर्वी तट पर बहती हैं। (ii) गर्म जलधाराएँ गर्म जल को ठंडे जल क्षेत्रों में पहुँचाती हैं और प्राय: महाद्वीपों के पूर्वी तटों पर बहती हैं (दोनों गोलार्धों के निम्न व मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों में)। उत्तरी गोलार्ध में, ये जलधाराएँ उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में महाद्वीपों के पश्चिमी तट पर बहती हैं।

प्रमुख महासागरीय धाराएँ

प्रमुख महासागरीय धाराएँ प्रचलित पवनों और कोरियालिस प्रभाव से अत्यधिक प्रभावित होती हैं। महासागरीय जलधाराओं का प्रवाह वायुमंडीय प्रवाह से मिलता-जुलता है। मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों में, महासागरों पर वायु प्रतिचक्रवात के रूप में बहती है। दक्षिणी गोलार्ध में, यह प्रवाह उत्तरी गोलार्ध की अपेक्षा अधिक स्पष्ट है। महासागरीय धाराएँ भी लगभग इसी के अनुरूप प्रवाहित होती हैं। उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में, वायु प्रवाह मुख्यतः चक्रवात के रूप में होता है और महासागरीय धाराएँ भी इसी का अनुकरण करती हैं। मानसून प्रधान क्षेत्रों में, मानसून पवनों का प्रवाह जलधाराओं के प्रवाह को प्रभावित करता है। निम्न अक्षांशों से बहने वाली गर्म जलधाराएँ कोरियोलिस प्रभाव के कारण, उत्तरी गोलार्ध में अपने बाईं तरफ़ और दक्षिणी गोलार्ध में अपने दायों तरफ मुड़ जाती हैं।

महासागरीय जलधाराएँ भी वायुमंडलीय प्रवाह की भाँति गर्म अक्षांशों से ऊष्मा को स्थानांतरित करते हैं। आर्कटिक व अंटार्कटिक क्षेत्रों की ठंडी जलधाराएँ उष्ण कटिबंधीय व विषुवतीय क्षेत्रों की तरफ प्रवाहित होती हैं, जबकि यहाँ की गर्म जलधाराएँ ध्रुवों की तरफ जाती हैं। विभिन्न महासागरों की प्रमुख जलधाराओं को मानचित्र 13.3 में दर्शाया गया है।

प्रशांत, अटलांटिक और हिंद महासागर में बहने वाली धाराओं की सूची बनाइए। प्रचलित पवन धाराओं की गति को किस प्रकार प्रभावित करती है? चित्र 13.3 से कुछ उदाहरण दें।

महासागरीय धाराओं के प्रभाव

महासागरीय धाराएँ मानवीय क्रियाओं को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं। उष्ण व उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर ठंडी जलधाराएँ बहती हैं (विषुवतीय क्षेत्रों को छोड़कर) उनके औसत तापमान अपेक्षाकृत कम होते हैं व साथ ही दैनिक व वार्षिक तापांतर भी कम होता है। यहाँ कोहरा छा जाता है यद्यपि ये क्षेत्र प्रायः शुष्क हैं। मध्य व उच्च अक्षांशों में महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर गर्म जलधाराएँ बहती हैं जिसके कारण वहाँ एक अलग (अनूठी) जलवायु पाई जाती है। इन क्षेत्रों में ग्रीष्मऋतु अपेक्षाकृत कम गर्म और शीतॠतु अपेक्षाकृत मृदु होती है। यहाँ वार्षिक तापान्तर भी कम होता हैं उष्ण व उपोष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में गर्म जलधाराएँ महाद्वीपों के पूर्वी तटों के सामान्तर बहती है। इसी कारण यहाँ जलवायु गर्म व आर्द्र (वर्षा कारक) होती हैं। ये क्षेत्र उपोष्ण कटिबन्ध के प्रतिचक्रवातीय क्षेत्रों के पश्चिमी किनारों पर स्थित हैं। जहाँ गर्म व ठंडी जलधाराएँ मिलती हैं वहाँ ऑक्सीजन की आपूर्ति प्लैंकटन बढ़ोतरी में सहायक होती है जो मछलियों का प्रमुख भोजन है। संसार के प्रमुख मत्स्य क्षेत्र इन्हीं क्षेत्रों (जहाँ गर्म व ठंडी जलधाराएँ मिलती हैं) में पाए जाते हैं।

अभ्यास

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न :

(i) महासागरीय जल की ऊपर एवं नीचे गति किससे संबंधित है?
(क) ज्वार
(ख) तरंग
(ग) धाराएँ
(घ) ऊपर में से कोई नहीं

(ii) वृहत ज्वार आने का क्या कारण है?
(क) सूर्य और चंद्रमा का पृथ्वी पर एक ही दिशा में गुरुत्वाकर्षण बल
(ख) सूर्य और चंद्रमा द्वारा एक दूसरे की विपरीत दिशा से पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण बल
(ग) तटरेखा का दंतुरित होना
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं

(iii) पृथ्वी तथा चंद्रमा की न्यूनतम दूरी कब होती है?
(क) अपसौर
(ख) उपसौर
(ग) उपभू
(घ) अपभू

(iv) पृथ्वी उपसौर की स्थिति कब होती है?
(क) अक्टूबर
(ख) जुलाई
(ग) सितंबर
(घ) जनवरी

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए :

(i) तरंगें क्या हैं?

(ii) महासागरीय तरंगें ऊर्जा कहाँ से प्राप्त करती हैं?

(iii) ज्वार-भाटा क्या है?

(iv) ज्वार-भाटा उत्पन्न होने के क्या कारण हैं?

(v) ज्वार-भाटा नौसंचालन से कैसे संबंधित है?

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए :

(i) जल धाराएँ तापमान को कैसे प्रभावित करती हैं? उत्तर पश्चिम यूरोप के तटीय क्षेत्रों के तापमान को ये किस प्रकार प्रभावित करते हैं?

(ii) जल धाराएँ कैसे उत्पन्न होती हैं?

परियोजना कार्य

(i) किसी झील या तालाब के पास जाएँ तथा तरंगों की गति का अवलोकन करें। एक पत्थर फेंकें एवं देखें कि तरंगें कैसे उत्पन्न होती हैं।

(ii) एक ग्लोब या मानचित्र लें, जिसमें महासागरीय धाराएँ दर्शाई गई हैं, यह भी बताएँ कि क्यों कुछ जलधाराएँ गर्म हैं व अन्य ठंडी। इसके साथ ही यह भी बताएँ कि निश्चित स्थानों पर यह क्यों विक्षेपित होती हैं। कारणों का विवेचन करें।



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