गमन एवं संचलन

संचलन जीवों की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। जंतुओं एवं पादपों में अनेकों तरह के संचलन होते हैं। अमीबा सदृश एक कोशिक जीव में जीवद्रव्य का प्रवाही संचलन इसका एक साधारण रूप है। कई जीव पक्ष्माभ, कशाभ और स्पर्शक द्वारा संचलन दर्शाते हैं। मनुष्य अपने पाद, जबड़े, पलक, जिह्वा आदि को गतिशील कर सकता है। कुछ संचलनों में स्थान या अवस्थिति परिवर्तन होता है। ऐसे ऐच्छिक संचलनों को गमन कहते हैं। टहलना, दौड़ना, चढ़ना, उड़ना, तैरना आदि सभी गमन या संचलन के ही कुछ रूप हैं। चलन संरचनाओं का अन्य प्रकार की गति में संलग्न संरचनाओं से भिन्न होना आवश्यक नहीं है। उदाहरण के लिए, पैरामिशियम में पक्ष्माभ भोजन की कोशिका-ग्रसनी में प्रवाह और चलन दोनों कार्य होते हैं। हाइड्रा अपने स्पर्शक शिकार पकड़ने और चलन दोनों के लिए प्रयोग कर सकता है। हम अपने पाद शरीर की मुद्रा बदलने के लिए प्रयोग में लाते हैं और चलन के लिए भी। उपर्युक्त प्रेक्षणों से संकेत मिलता है कि गति और चलन का पृथक् रूप से अध्ययन नहीं किया जा सकता है। दोनों के संबंध को इस उक्ति में समाहित किया जा सकता है कि सभी चलन गति होते हैं; लेकिन सभी गति चलन नहीं हैं। जंतुओं के चलन के तरीके परिस्थिति की माँग और आवास के अनुरूप बदलते हैं। फिर भी चलन की क्रिया प्राय: भोजन, आश्रय, साथी, अनुकूल प्रजनन स्थल, अनुकूल प्राकृतिक स्थिति की तलाश या शत्रुओंभक्षियों से पलायन के लिए की जाती है।

17.1 गति के प्रकार

मानव शरीर की कोशिकाएं मुख्यतः तीन प्रकार की गति दर्शाती हैं, यथा-अमीबीय, पक्ष्माभी और पेशीय। आपने अध्याय 8 में पढ़ा है कि पक्ष्माभ एवं कशामिका कोशिका झिल्ली की अपवृद्धि है। कशामिका गति शुक्राणुओं को तैरने में सहायता करती है, स्पंज के नाल तंत्र में जल संचारण को बनाए रखती है तथा यूग्लीना जैसे प्रोटोजोआ में चलन का कार्य करती है।

हमारे शरीर में कुछ विशिष्ट कोशिकाएं, जैसे - महाभक्षकाणु (macrophages) और श्वेताणु (leucocytes) रुधिर में अमीबीय गति प्रदर्शित करती हैं। यह क्रिया जीवद्रव्य की प्रवाही गति द्वारा कूकूट पाद बनाकर की जाती है (अमीबा सदृश)। कोशिका कंकाल तंत्र जैसे - सूक्ष्मतंतु भी अमीबीय गति में सहयोगी होते हैं।

हमारे अधिकांश नलिकाकार अंगों में, जो पक्ष्माभ उपभित्ति से आस्तारित होते हैं, पक्ष्माभ गति होती है। श्वास नली में पक्ष्माभों की समन्वित गति से वायुमंडलीय वायु के साथ प्रवेश करने वाले धूल कणों एवं बाह्य पदार्थों को हटाने में मदद मिलती है। मादा प्रजनन मार्ग में डिंब का परिवहन पक्ष्माभ गति की सहायता से ही होता है।

हमारे पादों, जबड़ों, जिह्वा, आदि की गति के लिए पेशीय गति आवश्यक है। पेशियों के संकुचन के गुण का प्रभावी उपयोग मनुष्य और अधिकांश बहुकोशिकीय जीवों के चलन और अन्य प्रकार की गतियों में होता है। चलन के लिए पेशीय, कंकाल और तंत्रिका तंत्र की पूर्ण समन्वित क्रिया की आवश्यकता होती है। इस अध्याय में आप पेशियों के प्रकार, उनकी संरचना, उनके संकुचन की क्रियाविधि और कंकाल तंत्र के महत्वपूर्ण पहलू के बारे में जानेंगे।

17.2 पेशी

पेशी एक विशेष प्रकार का ऊतक है जिसकी उत्पत्ति अध्यजनस्तर से होती है। एक वयस्क मनुष्य के शरीर के भार का 40-50 प्रतिशत हिस्सा पेशियों का होता है। इनके कई विशेष गुण होते हैं, जैसे- उत्तेजनशीलता, संकुचनशीलता, प्रसार्य एंव प्रत्यास्थता। पेशियों को भिन्न-भिन्न आधारों पर वर्गीकृत किया गया है, जैसे-स्थापन, रंग-रूप और उनकी क्रिया की नियमन पद्धति। स्थापन के आधार पर, तीन प्रकार की पेशियाँ पाई जाती हैं - (i) कंकाल (ii) अंतरंग और (iii) हृद।

कंकाल पेशियाँ शारीरिक कंकाल अवयवों के निकट संपर्क में होती हैं। सूक्ष्मदर्शी द्वारा देखने पर इनमें धारियाँ दिखती हैं, अतः इन्हें रेखित पेशी कहते हैं। चूँकि इनकी क्रियाओं का तंत्रिका तंत्र द्वारा ऐच्छिक नियंत्रण होता है, अतः इन्हें ऐच्छिक पेशी भी कहते हैं। ये मुख्य रूप से चलन क्रिया और शारीरिक मुद्रा बदलने में सहायक होती हैं।

अंतरंग पेशियाँ शरीर के खोखले अंतरंग अगों; जैसे- आहार नाल, जनन मार्ग आदि की भीतरी भित्ति में स्थित होती हैं। ये अरेखित और चिकनी दिखती हैं। अतः इन्हें चिकनी पेशियाँ (अरेखित पेशी) कहते हैं। इनकी क्रिया तंत्रिका तंत्र के ऐच्छिक नियंत्रण में नहीं होती, इसलिए ये अनैच्छिक पेशियाँ कही जाती हैं। ये पाचन मार्ग द्वारा भोजन और जनन मार्ग द्वारा युग्मक (gamete) के अभिगमन (परिवहन) में सहायता करती हैं।

जैसा कि नाम से विदित है, हृद पेशियाँ हृदय की पेशियाँ हैं। कई हृद पेशी कोशिकाएं हृद पेशी के गठन के लिए शाश्वत रचना में एकत्रित होती हैं। रंग रूप के आधार पर, हृद पेशियाँ रेखित होती हैं। ये अनैच्छिक स्वभाव की होती हैं; क्योंकि तंत्रिका तंत्र इनकी क्रियाओं को सीधे नियंत्रित नहीं करता।

कंकाल पेशी की संरचना और संकुचन क्रियाविधि को समझने के लिए हम इसका विस्तार से परीक्षण करेंगें। हमारे शरीर में, प्रत्येक संगठित कंकाल पेशी कई पेशी बंडलों

या पूलिकाओं (fascicles) की बनी होती है, जो संयुक्त रूप से कोलैजनी संयोजी ऊतक स्तर से घिरे रहती हैं जिसे संपट्ट (fascia) कहते हैं। प्रत्येक पेशी बंडल में कई पेशी रेशे होते हैं (चित्र 17.1)। प्रत्येक पेशी रेशा प्लाज्मा झिल्ली से आस्तारित होता है

चित्र 17.1 पेशी समूह तथा पेशी तंतु को दर्शाते हुए पेशी का अनुप्रस्थ काट

जिसे सार्कोलेमा कहते हैं। पेशी रेशा एक संकोशिका है क्योंकि पेशीद्रव्य (sarcoplasm) में कई केंद्रक होते हैं। अंत:द्रव्य जालिका अर्थात् पेशी रेशों के पेशीद्रव्य जालिका (सारकोप्लाज्मिक रेटीक्यूलम) कैल्सियम आयनों का भंडार गृह है; पेशी रेशा की एक विशेषता पेशीद्रव्य में समांतर रूप से व्यस्थित अनेक तंतुओं की उपस्थिति है जिसे पेशीतंतु (मायोफिलामेंट) पेशीतंतुक (मायोफाईब्रिल) कहते हैं। प्रत्येक पेशी तंतुक में क्रमवार गहरे एवं हल्के पट्ट (बैंड) होते हैं। पेशी रेशक के विस्तृत अध्ययन ने यह स्थापित कर दिया है कि इनका रेखित रूप दो प्रमुख प्रोटीन - एक्टिन और मायोसिन के विशेष प्रकार के वितरण के कारण होता है। हल्के बैंडों में एक्टिन होता है जिसे I - बैंड या समदैशिक बैंड कहते हैं जबकि गहरे बैंडों को ‘A’ बैंड या विषम दैशिक बैंड कहते हैं जिसमें मायोसिन होता है। दोनों प्रोटीन छड़नुमा संरचनाओं में परस्पर समानांतर पेशी रेशक के अनुदैर्ध्य अक्ष के भी समानांतर व्यवस्थित होते हैं एक्टिन तंतु मायोसिन तंतुओं की तुलना में पतले होते हैं, अतः इन्हें क्रमशः पतले एवं मोटे तंतु कहते हैं। प्रत्येक $\mathrm{I}$-बैंड के मध्य में इसे द्विविभाजित करने वाली एक प्रत्यास्थ रेखा होती है, जिसे ’ $Z$ ‘-रेखा कहते हैं। पतले तंतु ’ $Z$ ‘-रेखा से दृढ़ता से जुड़े होते हैं। ’ $A$ ’ बैंड के मोटे तंतु, ’ $A$ ’ बैंड के मध्य में एक पतली रेशेदार झिल्ली, जिसे ’ $\mathrm{M}$ ‘-रेखा कहते हैं, द्वारा जुड़े होते हैं। पेशी रेशों की पूरी लंबाई में ‘A’ और ‘I’ बैंड एकांतर क्रम में व्यवस्थित होते हैं। दो अनक्रमित ‘Z’-रेखाओं के बीच स्थित पेशी रेशक का भाग एक संकुचन कार्य इकाई बनाता है जिसे सार्कोमियर कहते हैं (चित्र 17.2)। विश्राम की अवस्था में, पतले तंतुओं के सिरे दोनों ओर के मोटे तंतुओं के बीच के भाग को छोड़कर स्वतंत्र सिरों पर अतिच्छादित होते हैं।

( पतले तंतुओं के सिरे मोटे तंतुओं के सिरों के बीच में पाए जाते हैं) मोटे तंतुओं का केंद्रीय भाग जो पतले तंतुओं से अतिच्छादित नहीं होता, ’ $\mathrm{H}$ ‘-क्षेत्र कहलाता है।

17.2.1 संकुचनशील प्रोटीन की संरचना

प्रत्येक एक्टिन (पतले) तंतु एक दूसरे से सर्पिल रूप में कुंडलित दो ’ $\mathrm{F}$ ’ (तंतुमय) एक्टिनों का बना होता है। प्रत्येक ’ $F$ ’ एक्टिन ’ $G$ ’ (गोलाकार) एक्टिन इकाइयों का बहुलक है। एक दूसरे प्रोटीन, ट्रोपोमायोसिन के दो तंतु ’ $F$ ’ एक्टिन के निकट पूरी लंबाई में जाते हैं। एक जटिल ट्रोपोनिन प्रोटीन अणु ट्रोपोमायोसिन पर नियत अंतरालों पर पाई जाती है। विश्राम की अवस्था में ट्रोपोनिन की एक उप-इकाई एक्टिन तंतुओं के मायोसिन के बंध बनाने वाले सक्रिय स्थानों को ढक कर रखती है (चित्र 17.3 अ)।

प्रत्येक मायोसिन (मोटे) तंतु भी एक बहुलक प्रोटीन है। कई एकलकी प्रोटीन जिसे मेरोमायोसिन कहते हैं (चित्र 17.3 ब) एक मोटा तंतु बनाती हैं। प्रत्येक मेरोमायोसिन के दो महत्वपूर्ण भाग होते हैं- एक छोटी भुजा सहित गोलाकार सिर तथा एक पूँछ। सिर को

(ब)

चित्र 17.2 (अ) सार्कोमियर को दर्शाते हुए एक पेशी तंतु की संरचना (ब) एक सार्कोमियर का आरेख

(अ)

(ब)

चित्र 17.3 (अ) एक एक्टिन (पतला) तंतु (ब) एकल मायोसिन (मिरोमायोसिन)

भारी मेरोमायोसिन (HMM) और पूँछ को हल्का मेरोमायोसिन (LMM) कहते हैं। मेरोमायोसिन अवयव अर्थात् सिर एवं छोटी भुजा पर नियत दूरी तथा आपस में एक नियत दूरी नियत कोण पर $\mathrm{A}$ तंतु पर बाहर की तरफ उभरे होते हैं। जिसे क्रास भुजा (कॉस-आर्म) कहते हैं। गोलाकार सिर एक सक्रिय एटिपीऐज एंजाइम है जिसमें एटीपी के बंधन स्थान तथा एक्टिन के लिए सक्रिय स्थान होते हैं।

17.2.2 पेशी संकुचन की क्रियाविधि

पेशी संकुचन की क्रियाविधि को सर्पीतंतु सिद्धांत द्वारा अच्छी तरह समझाया जा सकता है जिसके अनुसार पेशीय रेशों का संकुचन पतले तंतुओं के मोटे तंतुओं के ऊपर सरकने से होता है।

केंद्रीय तंत्रिका तंत्र की प्रेरक तंत्रिका द्वारा एक संकेत प्रेषण से पेशी संकुचन का आरंभ होता है। एक प्रेरक न्यूरोन तथा इससे पेशीय रेशे एक प्रेरक इकाई का गठन करते हैं। प्रेरक तंत्रिएक और पेशीय रेशा के सार्कोलेमा की संधि को तंत्रिका-पेशीय संगम या प्रेरक अंत्य पट्टिका कहते हैं। इस संगम पर एक तंत्रिक संकेत पहुँचने से एक तंत्रिका संचारी (एसिटिल कोलिन) मुक्त होता है जो सार्कोलेमा में एक क्रिया विभव (action potential) उत्पन्न करता है। यह समस्त पेशीय रेशे पर फैल जाता है जिससे सार्कोप्लाज्म में कैल्सियम आयन मुक्त होते हैं। कैल्सियम आयन स्तर में वृद्धि से एक्टिन तंतु पर ट्रोपोनिन की उप इकाई से कैल्सियम बंध बनाकर एक्टिन के ढके हुए सक्रिय स्थानों को खोल देता है। ATP के जल अपघटन से प्राप्त ऊर्जा का उपयोग कर मायोसिन शीर्ष एक्टिन के खुले सक्रिय स्थानों से क्रास सेतु बनाने के लिए बँध जाते हैं (चित्र 17.4)। इस बंध से जुड़े हुए एक्टिन तंतुओं ’ $A$ ’ बैंड के केंद्र की तरफ खिंचते हैं इन एक्टिनों से जुड़ी हुई ‘A’ रेखा भी अंदर की तरफ खिंच जाती है जिससे सार्कोमियर

चित्र 17.4 क्रॉस सेतु के बनने की अवस्थाएं/शीर्ष का घूर्णन तथा क्रॉस सेतु का टूटना

छोटा हो जाता है अर्थात् संकुचित हो जाता है। ऊपर के चरणों से स्पष्ट है कि पेशी के छोटा होते समय अर्थात् संकुचन के समय ‘I’-बैंडों की लंबाई कम हो जाती है जबकि ’ $\mathrm{A}$ ‘-बैंडों की लंबाई ज्यों कि त्यों रहती है (चित्र 17.5)। $\mathrm{ADP}$ और $\mathrm{P} _{2}$ मुक्तकर, मायोसिन विश्राम अवस्था में वापस चला जाता है। एक नए ATP के बंधने से क्रास-सेतु टूटते हैं (चित्र 17.4)। मायोसिन शीर्ष ATP को अपघटित कर पेशी के ओर संकुचन के लिए क्रिया दोहराते हैं किंतु तंत्रिका संवेगी के समाप्त हो जाने पर सार्कोप्लाज्मिक रेटीक्यूलम द्वारा $\mathrm{Ca}^{+1}$ के अवशोषण से एक्टिन स्थल पुनः ढक जाते हैं। इसके फलस्वरूप ’ $Z$ ‘-रेखाएं अपने मूल स्थान पर वापस हो जाती हैं; अर्थात् शिथिलन हो जाता है। विभिन्न पेशियों में रेशों की प्रतिक्रिया अवधि में अंतर हो सकता है। पेशियों के बार-बार उत्तेजित होने पर उनमें ग्लाइकोजन के अवायवी विखंडन से लैक्टिक अम्ल का जमाव होने लगता है जिससे थकान (श्रांति) होती है। पेशी में ऑक्सीजन भंडारित करने वाला लाल रंग का एक मायोग्लोबिन होता है। कुछ पेशियों में मायोग्लोबिन की मात्रा ज्यादा होती है जिससे वे लाल रंग के दिखते हैं। ऐसी पेशियों को लाल पेशियाँ कहते हैं। ऐसी पेशियों में माइट्रोकोंड्रिया अधिक होती हैं जो ATP के निर्माण हेतु उनमें भंडारित ऑक्सीजन की बड़ी मात्रा का उपयोग कर सकती हैं। इसलिए, इन पेशियों को वायुजीवी पेशियाँ भी कह सकते हैं। दूसरी तरफ, कुछ पेशियों में मायोग्लोबिन की बहुत कम मात्रा पाई जाती है जिससे वे हल्के रंग की अथवा श्वेत प्रतीत होती हैं। ये श्वेत पेशियाँ हैं। इनमें माइटोकोंड्रिया तो अल्पसंख्यक होती है, लेकिन पेशीद्रव्य जालिका अत्यधिक मात्रा में होती हैं। ये अवायवीय विधि द्वारा ऊर्जा प्राप्त करती हैं।

चित्र 17.5 पेशी संकुचन का सर्पी तंतु सिद्धांत (पतले तंतु की गति एवं $\mathrm{I}$ बैंड तथा $\mathrm{H}$ क्षेत्र की तुलनात्मक आकार)

17.3 कंकाल तंत्र

कंकाल तंत्र में अस्थियों का एक ढांचा और उपास्थियां होती हैं। शरीर की गति में इस तंत्र की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कल्पना कीजिए; जब बिना जबड़ों के भोजन चर्वण करना पड़े और बिना पाद अस्थियों के टहलना हो। अस्थि एवं उपास्थि विशेष प्रकार के संयोजी ऊतक हैं। मैट्रिक्स में लवणों की उपस्थिति से अस्थियाँ कठोर होती हैं जबकि कोंड्रोइटिन (chondroitin) लवण उपास्थियों के मैट्रिक्स को आनन्य (pliable) बनाते हैं। मनुष्य में, यह तंत्र 206 अस्थियों और कुछ उपास्थियों का बना होता है। इसे दो मुख्य समूहों में बाँटा गया है- अक्षीय कंकाल एवं उपांगीय कंकाल।

अक्षीय कंकाल में 80 अस्थियाँ होती हैं जो शरीर की मुख्य अक्ष पर वितरित होती हैं। करोटि, मेरुदंड, उरोस्थि (स्टर्नम) और पसलियाँ अक्षीय कंकाल का गठन करती हैं। करोटि (चित्र 17.6) अस्थियों के दो समुच्चय- कपालीय (cranial) और आननी (facial) से बना है जिनका योग 22 है। कपालीय अस्थियों की संख्या 8 होती है। ये मस्तिष्क के लिए कठोर रक्षक बाह्य आवरण- कपाल को बनाती हैं। आननी भाग में 14 कंकाली अवयव (skeletal elements) होते हैं जो करोटि के सामने का भाग बनाते हैं।

चित्र 17.6 मनुष्य की करोटि का आरेख

चित्र 17.7 मेरुदंड (दायाँ पार्श्व दृश्य) एक U - आकार की एकल अस्थि हाइऑइड (hyoid) मुख गुहा के नीचे स्थित होती है, यह भी कपाल में ही सन्निहित है। प्रत्येक मध्यकर्ण में तीन छोटी अस्थियाँ होती हैं-मैलियस, इनकस एवं स्टेपीज। इन्हें सामूहिक रूप से कर्ण अस्थिकाएं कहते हैं। कपाल भाग कशेरूक दंड के अग्र भाग के साथ दो अनुकपाल अस्थिकंदों (occipital condyles) की सहायता से संधियोजन करता है (द्विकंदीय करोटिया डाइकोंडाइलिक स्कल)।

हमारा कशेरुक दंड (चित्र 17.7) क्रम में व्यस्थित पृष्ठ भाग में स्थित 26 इकाइयों का बना है जिन्हें कशेरुक कहते हैं। यह कपाल के आधार से निकलता और धड़ भाग का मुख्य ढांचा तैयार करता है। प्रत्येक कशेरुक के बीच का भाग खोखला (तंत्रकीय नाल) होता है जिससे होकर मेरुरज्जु ( spinal cord) गुजरती है। प्रथम कशेरुक एटलस है और यह अनुकपाल अस्थिकंदों के साथ संधियोजन करता है। कशेरुक दंड, कपाल की ओर से प्रारंभ करने पर, ग्रीवा (7), वक्षीय (12), कटि (5), त्रिक सेक्रमी (1-संयोजित) और अनुत्रिक (1-संयोजित) कशेरुकों में विभेदित होता है। ग्रीवा कशेरुकों की संख्या मनुष्य सहित लगभग सभी स्तनधारियों में

7 (सात) होती है। कशेरुक दंड मेरुरज्जु (spinal cord) की रक्षा करता है, सिर का आधार बनाते हैं और पसलियों तथा पीठ की पेशियों के संधि स्थल का निर्माण करते हैं। उरोस्थि (sternum) वक्ष की मध्य अधर रेखा पर स्थित एक चपटी अस्थि है।

पसलियों (Ribs) की 12 जोड़ियाँ होती हैं। प्रत्येक पसली एक पतली चपटी अस्थि है जो पृष्ठ भाग में कशेरुक दंड और अधर भाग में उरोस्थि के साथ जुड़ी होती हैं। इसके पृष्ठ सिरे पर दो संधियोजन सतहें होती हैं जिसके कारण इसे द्विशिरस्थ (bicephalic) भी कहते हैं। प्रथम सात जोड़ी पसलियों को वास्तविक पसलियाँ कहते हैं। पृष्ठ में ये वक्षीय कशेरुकों और अधरीय भाग में उरोस्थि से काचाभ उपास्थि (hyaline cartilage) की सहायता से जुड़ी होती हैं। 8 वीं, 9 वीं और 10 वीं जोड़ी-पसलियाँ उरोस्थि के साथ सीधे संधियोजित नहीं होतीं, बल्कि काचाभ उपास्थि के सहयोग से सातवीं पसली से जुड़ती हैं। इन्हें वर्टिब्रोकांड्रल (कूट) पसलियाँ कहते हैं। पसलियों की अंतिम दो जोड़याँ (11वीं और 12 वीं) अधर में जुड़ी हुई नहीं होतीं, इसलिए उन्हें प्लावी पसलियाँ (floating ribs) कहते हैं। वक्षीय कशेरुक, पसलियाँ और उरोस्थि मिलकर पसली पंजर (rib cage) की संरचना करते हैं (चित्र 17.8)।

पादों की अस्थियाँ अपनी मेखला के साथ उपांगीय कंकाल बनाती हैं। प्रत्येक पाद में 30 अस्थियाँ पाई जाती हैं अग्रपाद (भुजा) की अस्थियाँ हैं- ह्यूमेरस, रेडियस और अल्ना, कार्पल्स (कलाई की अस्थियाँ - संख्या में 8), मेटा कार्पल्स (हथेली की अस्थियाँ- संख्या में 5 ) और फैलेंजेज (अंगुलियों की अस्थियाँ-संख्या में 14) (चित्र 17.9)। फीमर (उरु अस्थि - सबसे लम्बी अस्थि), टिबिया और फिबुला, टार्सल (टखनों की अस्थियाँ - संख्या में 7), मेटाटार्सल (संख्या में 5) और अंगुलि अस्थियाँ फैलेंजेज (चित्र 17.10)। कप के आकार की एक अस्थि जिसे पटेल्ला (Patella) कहते हैं। घुटने को अधर की ओर से ढकती है (घुटना फलक)।

अंस और श्रोणि मेखला अस्थियाँ अक्षीय कंकाल तथा क्रमशः अग्र एवं पश्च पादों के बीच संधियोजन में सहायता करती हैं। प्रत्येक मेखला के दो अर्ध भाग होते हैं। अंस मेखला के प्रत्येक अर्ध भाग में एक क्लेविकल एवं एक स्कैपुला होती है (चित्र 17.9)। स्कैपुला वक्ष के पृष्ठ भाग

चित्र 17.8 पसलियाँ तथा पिंजर

चित्र 17.9 दाँयी अंस मेखला तथा अग्रपाद अस्थियां (सामने से अभिदर्शित)

चित्र 17.10 दाईं श्रोणि अस्थि एवं पश्च पाद अस्थियाँ (सामने से अभिदर्शित) में दूसरे एवं सातवीं पसली के बीच स्थित एक बड़ी चपटी, त्रिभुजाकार अस्थि है। स्कैपुला के पश्च चपटे त्रिभुजाकार भाग में एक उभार (कंटक) एक विस्तृत चपटे प्रबंध के रूप में होता है जिसे एक्रोमिन कहते हैं। क्लैविकिल इसके साथ संधियोजन करती हैं। एक्रोमिन के नीचे एक अवनमन जिसे ग्लीनॉयड गुहा कहते हैं ह्युमूरस के शीर्ष के साथ कंधों की जोड़ बनाने के लिए संधियोजन करती है। प्रत्येक क्लैविकल एक लंबी पतली अस्थि है, जिसमें दो वक्र पाए जाते हैं। इस अस्थि को सामान्यतः जत्रुक ( collar bone) कहते हैं।

श्रोणि मेखला (Pelvic girdle) में दो श्रोणि अस्थियाँ होती हैं (चित्र 17.10)। प्रत्येक श्रोणि अस्थि तीन अस्थियों के संलयन से बनी होती है- इलियम, इस्चियम और प्युबिस। इन अस्थियों के संयोजन स्थल पर एक गुहा एसिटैबुलम होती है जिससे उरु अस्थि संधियोजन करती है। अधर भाग में श्रोणि मेखला के दोनों भाग मिलकर प्युबिक संलयन (Pubic symphysis) बनाते हैं जिसमें रेशेदार उपास्थि होती है।

17.4 संधियाँ या जोड़

संधियाँ या जोड़ हर प्रकार की गति के लिए आवश्यक है जिनमें शरीर की अस्थियाँ सहयोगी होती हैं चलन गति भी इसका अपवाद नहीं है। जोड़ अस्थियों अथवा एक अस्थि एवं एक उपास्थि के बीच का संधिस्थल है। जोड़ों द्वारा गति के लिए पेशी जनित बल का उपयोग किया जाता है। यहाँ जोड़ आलंब (fulcrum) का कार्य करते हैं। इन जोड़ों पर गति विभिन्न कारकों पर निर्भरता के कारण बदलती हैं। जोड़ों को मुख्यतः तीन संरचनात्मक रूपों में वर्गीकृत किया गया है, जैसे- रेशीय, उपास्थियुक्त और साइनोवियल ( स्राव)।

रेशीय जोड़ किसी प्रकार की गति नहीं होने देते। इस तरह के जोड़ द्वारा कपाल की चपटी अस्थियाँ, जो घने रेशीय संयोजी ऊतक की सहायता से सीवन (sutures) के रूप में कपाल बनाने के लिए संयोजित होती हैं।

उपास्थि युक्त जोड़ों में, अस्थियाँ आपस में उपास्थियों द्वारा जुड़ी होती हैं। कशेरुक दंड में दो निकटवर्ती कशेरुकों के बीच इसी प्रकार के जोड़ हैं जो सीमित गति होने देते हैं।

साइनोवियल जोड़ों की विशेषता दो अस्थियों की संधियोजन सतहों के बीच तरल से भी साईनोवियल गुहा की उपस्थिति है। इस तरह की व्यवस्था में पर्याप्त गति संभव है। ये जोड़ चलन सहित कई तरह की गति में सहायता करते हैं। कंदुक खल्लिका संधि ( ह्युमूरस और अंस मेखला के बीच), कब्जा संधि (घुटना संधि), धुराग्र संधि (पाइवट

संधी - एटलस और अक्ष के बीच), विसर्पी संधि (ग्लाइडिंग संधि कार्पल्स के बीच) और सैडल जोड़ (अंगूठे के कार्पल और मेटा कार्पल के बीच) इनके कुछ उदाहरण हैं।

17.5 पेशीय और कंकाल तंत्र के विकार

माइस्थेनिया ग्रेविस (Myasthenia gravis): एक स्वप्रतिरक्षा विकार जो तंत्रिका- पेशी संधि को प्रभावित करता है। इससे कमजोरी और कंकाली पेशियों का पक्षघात होता है। पेशीय दुष्पोषण (Muscular dystrophy): विकारों के कारण कंकाल पेशी का अनुक्रमित अपह्नासन।

अपतानिका : शरीर में कैल्सियम आयनों की कमी से पेशी में तीव्र ऐंठन।

संधि शोथ (Arthritis): जोड़ों की शोथ।

अस्थि सुषिरता (Osteoporosis) : यह उम्र संबंधित विकार है जिसमें अस्थि के पदार्थो में कमी से अस्थि भंग की प्रबल संभावना हैं। एस्ट्रोजन स्तर में कमी इसका सामान्य कारक है।

गाउट (Gout): जोड़ों में यूरिक अम्ल कणों के जमा होने के कारण जोड़ों की शोथ।

सारांश

गति सजीवों की एक आवश्यक विशेषता है। जीवद्रव्य की प्रवाही गति, पक्ष्माभी गति, पख, पादों, पंखों, आदि की गति प्राणियों द्वारा दर्शित गतियों के कुछ रूप हैं। ऐच्छिक गति जिनसे प्राणियों में स्थान परिवर्तित होता है, चलन कहलाती है। प्राणी प्राय: भोजन, आश्रय, साथी, प्रजनन स्थल, अनुकूल प्राकृतिक स्थिति की तलाश या अपनी रक्षा के लिए चलते हैं।

मनुष्य शरीर की कोशिकाएं अमीबीय, पक्ष्माभी और पेशीय गति दर्शाती हैं। चलन और अन्य प्रकार की गतियों के लिए समन्वित पेशीय क्रियायों की आवश्यकता होती है। हमारे शरीर में तीन प्रकार की पेशियाँ होती हैं। कंकाल पेशियाँ कंकाल अवयवों से जुड़ी होती हैं। वे रेखित एवं ऐच्छिक स्वभाव की होती हैं। अंतरंग अंगों की भीतरी भित्ति में स्थित अंतरंग पेशियाँ अरेखित एवं अनैच्छिक होती हैं। हृद पेशियाँ हृद्य की पेशियाँ हैं। वे रेखित, शाखित और अनैच्छिक होती हैं। पेशियों में उत्तेजनशीलता, संकुचनशीलता, प्रसार्य और प्रत्यास्थता जैसे गुण होते हैं।

पेशीरेशा, पेशी की शारीरीय इकाई है। प्रत्येक पेशीरेशे में कई सामानांतर रूप से व्यवस्थित पेशीतंतुक (मायोफाईब्रिल) होते हैं। प्रत्येक पेशीतंतुक में कई क्रमवार व्यवस्थित क्रियात्मक इकाइयाँ, सार्कोमियर होते हैं। प्रत्येक सार्कोमियर के केंद्र में घने मायोसिन तंतुओं से बना $\mathrm{A}$-बैंड, और $\mathrm{Z}$-रेखा के दोनों तरफ पतले एक्टिन तंतुओं से बने दो अर्द्ध $\mathrm{I}-$ बैंड होते हैं। एक्टिन और मायोसिन संकुचनशील बहुलक प्रोटीन हैं। विश्राम की अवस्था में, एक्टिन तंतु पर मायोसिन के लिए सक्रिय स्थान ट्रोपोनिन (प्रोटीन) से ढके होते हैं। मायोसिन शीर्ष पर एटिपेज, एटीपी बंध स्थल और एक्टिन के लिए सक्रिय स्थान होते हैं। पेशीरेशे में प्रेरक तंत्रिका के संकेत से क्रिया विभव उत्पन्न होती है। इससे सार्कोप्लाजमिक जालिका कैल्सियम आयन $\left(\mathrm{Ca}^{++}\right)$मुक्त करती है। कैल्सियम आयन एक्टिन को मायोसिन के शीर्ष से कॉस-सेतु निर्माण हेतु सक्रिय करते हैं। ये

क्रास-सेतु एक्टिन तंतुओं को खींचते हैं जिससे एक्टिन तंतु मायोसिन तंतुओं पर सरकने लगते हैं और संकुचन होता है। तत्पश्चात् कैल्सियम आयन सार्कोप्लाजमिक जालिका में वापस चले जाते हैं, जिससे एक्टिन निष्क्रिय हो जाते हैं। कॉस-सेतु टूट जाता है और पेशियाँ शिथिलित हो जाती हैं।

बार-बार उत्तेजित करने से पेशी में थकान ( श्रांति) हो जाती है। लाल रंग के मायोग्लोबिन वर्णक की मात्रा की उपस्थिति के आधार पर पेशियाँ लाल और श्वेत पेशी रेशों में वर्गीकृत की गई हैं।

अस्थियाँ एवं उपास्थियाँ कंकाल तंत्र बनाते हैं। कंकाल तंत्र को अक्षीय और उपांगीय प्रकारों में विभाजित किया गया है। करोटि, कशेरुक दंड, पसलियाँ और उरोस्थि अक्षीय कंकाल बनाते हैं। पाद अस्थियाँ और मेखला उपांगीय कंकाल का गठन करते हैं। अस्थियों या अस्थि और उपास्थि के बीच तीन प्रकार के जोड़ (संधि) पाए जाते हैं- रेशीय, उपास्थियुक्त और साइनोवियल। साइनोवियल जोड़ों में पर्याप्त गति संभव है और इसलिए ये चलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।



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